टीबी संक्रमण रोकने के लिए ‘हाई रिस्क’ मरीजों की एक्स-रे जांच हुई अनिवार्य

हरदोई, 19 जनवरी 2026। उत्तर प्रदेश सरकार ने टीबी (क्षय रोग) के उन्मूलन की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए अब सभी संदिग्ध मरीजों के लिए एक्स-रे जांच को अनिवार्य कर दिया है। महानिदेशक, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य डॉ. रतनपाल सिंह सुमन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के क्रम में जनपद में भी इस पर कड़ाई से अमल शुरू हो गया है.
क्यों जरूरी है एक्स-रे जांच?
मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. भवनाथ पाण्डे ने बताया कि एक्स-रे टीबी की पहचान के लिए एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक टूल है. इससे बीमारी के शुरुआती संकेत मिल जाते हैं, जिससे न केवल समय पर इलाज शुरू होता है, बल्कि संक्रमण को दूसरों में फैलने से भी रोका जा सकता है. टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत मृत्यु दर में कमी लाना और नए मामलों को रोकना प्राथमिकता है.
इन 10 समूहों पर रहेगा विशेष फोकस
शासन ने 10 ऐसे ‘उच्च जोखिम’ (High Risk) समूहों की पहचान की है, जिनका अनिवार्य रूप से एक्स-रे कराया जाएगा और डेटा निक्षय पोर्टल पर अपलोड होगा:
- डायबिटीज या एचआईवी से पीड़ित व्यक्ति.
- धूम्रपान, नशा या शराब का सेवन करने वाले लोग.
- टीबी के पूर्व मरीज और वर्तमान रोगियों के संपर्क में रहने वाले व्यक्ति.
ओपीडी में ‘लाल मोहर’ से होगी पहचान
अस्पताल की ओपीडी में आने वाले ऐसे मरीजों की पहचान के लिए उनकी पर्ची पर लाल मोहर या सितारा चिन्ह लगाया जाएगा. इसके बाद मेडिकल ऑफिसर उन्हें प्राथमिकता के आधार पर एक्स-रे के लिए रेफर करेंगे.
जांच के लिए पर्याप्त संसाधन
जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. नौमान उल्लाह ने जानकारी दी कि कई बार बलगम की जांच नेगेटिव आने पर भी एक्स-रे से फेफड़ों में संक्रमण या सूजन का पता चल जाता है. यह तकनीक निमोनिया और फेफड़ों के कैंसर के बीच अंतर स्पष्ट करने (डिफरेंशियल डायग्नोसिस) में भी मददगार है.
- उपलब्धता: जनपद के जिला अस्पताल सहित सभी 12 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) पर एक्स-रे मशीनें उपलब्ध हैं.
- आधुनिक तकनीक: आवश्यकतानुसार पोर्टेबल हैंडहेल्ड एक्स-रे मशीनों की भी व्यवस्था की गई है.
- पुष्टि: यदि एक्स-रे में लक्षण मिलते हैं, तो ट्रूनैट, सीबीनेट या बलगम की जांच से बीमारी की पुष्टि की जाती है.



