कभी ऑटो ड्राइवर, कभी पंचर की दुकान… अब बने ‘फर्जी पत्रकार’
ट्रैफिक कर्मियों से वसूली का सबसे आसान जरिया बना फर्जी खबरें

लखनऊ। शहर में इन दिनों ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने में जुटे कर्मियों के सामने कानून से ज्यादा एक नया खतरा खड़ा हो गया है—कथाकथित यूट्यूबर और फर्जी पत्रकारों की वसूली गैंग। हैरानी की बात यह है कि जो लोग कभी ऑटो चलाते थे, तो कोई पंचर की दुकान लगाता था, वही आज हाथ में कैमरा और माइक लेकर खुद को पत्रकार बताकर ट्रैफिक कर्मियों से पैसे ऐंठने में जुटे हैं।
सूत्रों के अनुसार, ये कथाकथित पत्रकार ट्रैफिक चेकिंग के दौरान मौके पर पहुंच जाते हैं और किसी न किसी बात को तोड़-मरोड़ कर वीडियो बनाते हैं। इसके बाद “खबर चला देंगे”, “वीडियो वायरल कर देंगे” जैसी धमकियां देकर ट्रैफिक कर्मियों से पैसे की मांग की जाती है। पैसे न देने पर या टालने की कोशिश करने पर खुलेआम कहा जाता है—
“कुछ नहीं तो दो बीयर का पैसा ही दे दीजिए।”
सबसे चिंताजनक बात यह है कि ट्रैफिक कर्मी अगर नियमों के तहत वाहन सीज करें या चालान काटें, तो उन्हीं पर झूठे आरोप मढ़ दिए जाते हैं। वीडियो और खबरों के जरिए उन्हें भ्रष्ट बताने की कोशिश की जाती है, जबकि असल मकसद सिर्फ वसूली होता है।
ट्रैफिक विभाग के कई कर्मियों का कहना है कि अवैध डग्गामार बसों, ओवरलोडिंग और बिना परमिट वाहनों पर कार्रवाई करने पर ये लोग और ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं, क्योंकि वहां से वसूली की गुंजाइश ज्यादा होती है। नतीजा यह कि ईमानदारी से ड्यूटी कर रहे कर्मी मानसिक दबाव में आ जाते हैं।
जानकारों का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म का गलत इस्तेमाल कर पत्रकारिता की साख को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। बिना किसी मान्यता, पहचान या नैतिकता के खुद को मीडिया बताने वाले लोग न सिर्फ प्रशासन को बदनाम कर रहे हैं, बल्कि असली पत्रकारिता पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं।
अब जरूरत है कि प्रशासन ऐसे कथाकथित पत्रकारों की पहचान कर सख्त कार्रवाई करे, ताकि कानून के रखवाले बेखौफ होकर अपनी जिम्मेदारी निभा सकें और पत्रकारिता की गरिमा भी बनी रहे।



