कार्रवाई करने पर ही सवालों के घेरे में ट्रैफिक पुलिस, जिम्मेदारी से बच रहा सिस्टम

लखनऊ। सड़क सुरक्षा और यातायात व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए कार्रवाई करने वाली ट्रैफिक पुलिस इन दिनों खुद निशाने पर है। नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों पर चालान, गाड़ी रोकने या सीज करने की वैधानिक कार्रवाई के बाद ट्रैफिक कर्मियों पर झूठे आरोप लगाए जाने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, कई मामलों में कार्रवाई से असंतुष्ट वाहन संचालक या प्रभावशाली लोग शिकायतों का सहारा लेकर ट्रैफिक पुलिस को दबाव में लेने की कोशिश करते हैं। हैरानी की बात यह है कि कई बार उच्च अधिकारी भी मामले की गहन जांच के बजाय औपचारिक खानापूर्ति कर उल्टा ट्रैफिक पुलिसकर्मियों पर ही कार्रवाई कर देते हैं। बताया जा रहा है कि गाड़ी सीज करने जैसी सख्त कार्रवाई के बाद ट्रैफिक पुलिस पर भ्रष्टाचार या दुर्व्यवहार के झूठे आरोप लगाए जाते हैं, जबकि मौके की वास्तविक परिस्थितियों और साक्ष्यों की अनदेखी कर दी जाती है। इससे ईमानदारी से ड्यूटी करने वाले कर्मियों का मनोबल टूट रहा है।
वहीं दूसरी ओर, अवैध डग्गामार बसों और बिना मानक संचालन वाले वाहनों पर आरटीओ विभाग की कार्रवाई सवालों के घेरे में है। नियमों का खुला उल्लंघन कर सड़कों पर दौड़ रही इन बसों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होती, लेकिन जब कोई दुर्घटना या अव्यवस्था होती है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी ट्रैफिक पुलिस पर डाल दी जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यातायात व्यवस्था की जिम्मेदारी साझा है, जिसमें ट्रैफिक पुलिस के साथ-साथ आरटीओ और अन्य संबंधित विभागों की भी समान भूमिका है। केवल एक विभाग पर कार्रवाई का दबाव बनाना न तो न्यायसंगत है और न ही व्यवस्था सुधारने में सहायक। अब जरूरत इस बात की है कि निष्पक्ष जांच, विभागीय समन्वय और जिम्मेदारी तय करने की स्पष्ट नीति बनाई जाए, ताकि नियमों का पालन कराने वाले ही कटघरे में खड़े न हों और अवैध संचालन पर सख्ती से लगाम लगाई जा सके।



