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जानिये मुसलमानों में बेरोजगारी की क्या वजह

जानिये मुसलमानों में बेरोजगारी की क्या वजह

सदाम हुसैन 06 साल पहले गरीबी से त्रस्त होकर बिहार से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ आया था अपना घर बार छोडक़र लखनऊ में कमाने आया। आंखों में बेहतर भविष्य के सपने थे और दिल में मेहनत करने का संकल्प था लेकिन उसका जीवन नहीं बदला और वह अपने फूफा की दुकान पर बारबर (नाई) का काम करने लगा।
उसने 2015 में एक प्राइवेट स्कूल से हाईस्कूल का फार्म डालकर परीक्षा दी। जिसमें वह पास हो गया, लेकिन परीक्षा में पास होने के बावजूद भी उसके दिल में और सपने थे। वह आज भी नाई का काम करता है। उसका परिवार बहुत गरीब है उसने पढ़ाई की उम्र हाथ में कैची थमा दी गई, 12 वर्ष की उम्र से नाई का कम करता है। उसने कई बार पढ़ाई की तरफ ध्यान दिया, लेकिन हालात और अधिक काम के कारण वह पढ़ाई की तरफ ध्यान नहीं दे पाया। आखिर एक दिन उसने हालात से समझौता कर लिया। उसने सोच लिया कि उसे बड़े होकर कमाना ही है परिवार का पालन पोषण करना ही है। तो क्यों हम बारबर ही बने रहे। 
लाखों मुसलमान नौजवानों की कहानी है
वह पहले सोचता था कि मैं ही गरीब से परेशान हूं, लेकिन जब वह शहर आया और लोगों को सडक़ों पर सो हुए देखा। बच्चों को भीख मांगते हुए देखा। उससे बड़े उम्र के लोगों को मजदूरी करते देखा, तो उसके होश उड़ गये, लेकिन अल्लाह का शुक्र था कि वह बारबर का काम जाता था। पर शहर के लोगों बाल और दाढ़ी न बनाने के वजह से वह चिंता में था कि वह कैसे काम करेंगा। गुलशन फूफा के विदेश जाने के बाद से वह अपने फूफा की बारबर की दुकान सम्भालने लगा। उसे शुरूआती दिनों पर परेशानियां आईं, लेकिन वह धीरे-धीरे ठीक हो गई। पहले वह सोचता था कि केवल वहीं बेरोजगार और अनपढ़ है लेकिन उत्तर प्रदेश की राजधानी में रहते-रहते उसे पूरे शहर की जानकारियां मिली तो वह दंग रह गया। अब वह परिवार का पालन पोषण कर खुश है। उसे दूसरों के पास नौकरी मांगने नहीं जानी पड़ती। बातचीत के दौरान उसने बताया कि आज भी उसके गांव में 50 प्रतिशत बच्चे पढऩे नहीं जाते। वह अपने पिता के कारोबार व खेती किसानी में मदद करते है। उसने बताया कि गांव में मुसलिम परिवार के लोगों अपने व्यवसाय करने में ज्यादा विश्वास रखते है। जिसके कारण उन्हें बचपन से ही मोटर साइकिल बनाना, गाड़ी बनाना, बढ़ई का कार्य, नाई कार्य सहित अन्य काम सिखाया जाने लगता है। जिससे वह पढ़ाई को छोडक़र दूसरे कामों में लग जाते है। उनका बचपन मजदूरी करने में गुजर जाता है। कम पढ़े लिखे होने के कारण समप्रादियक लोग उनका भरपूर फायदा उठाते है। कभी हिन्दु-मुस्लिम की लड़ाई पर, तो कभी सिया-सुन्नी के नाम पर लड़वाते है। जिसका खामिया उनके परिवार को भुगतना पड़ता है। वह अपने भाईयों से अपनी करना चाहता हैं कि वह पढ़ाई पर विशेष ध्यान दें, ताकि वह अपना अच्छा बुरा सोच सकें। अक्सर लोग कम पढ़े लिखे होने के कारण वह अपराध की दुनिया में कदम रख देते है। जिसका सारा आरोप मुस्लिम समाज पर आता है।